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ए खुदा •••••?



ए खुदा इस देश से मुझे अलग करो
नहीं तो भ्रष्टाचार खत्म करो

        ए खुदा इस देश में आजादी लाओ
         नहीं तो लोगों के जान बचाओ

ए खुदा इस देश से प्रांतीयता मिटाओ
नहीं तो इस देश से गरीबी हटाओ

         ए खुदा सच के साथ चल दो
         और झुट को खत्म कर दो

ए खुदा यहाँ के राक्षसों को ले के जाओ
और साधु- संतों को ले के आओ

           ए खुदा यह दुनिया अंधी हैं
           मैं कहता हूँ भ्रष्टाचार को बंदी हैं

काम करो मन से
गीत गाए तन से

   ए खुदा सिखाओ इनको लढ़ने के लिए          
   और आजादी की ओर बढ़ने के लिए
         
           ( जय हिंद जय महाराष्ट्र )
             
                              (  शिवानंद सरवदे  )

पाठशाला


जब थे पाठशाला में
आते थे विचार
कभी पोलिस बनेंगे
तो कभी वकिल बनेंगे

              जब पड़ते थे मार
              तब याद आती थी घर
              कभी लगता था छोड़ेंगे
              तो कभी लगता जाएंगे                      

उसमें कभी लगता था,
हम हमारे देश के लिए लढ़ेंगे
लढ़ते-लढ़ते  भगतसिंग बनेंगे
भगतसिंग बनकर आगे बढ़ेंगे

    उसने सिखाया हमें जीना-मरना
    उसने सिखाया दीन-दलितों की सेवा करना
    मुसीबतों से कैसे लढ़ना
    जीवन में आगे कैसे बढ़ना
                                 
                                (  शिवानंद सरवदे )

तड़प



पास रहकर भी, दुर लग रही हो

क्यों मुझे तड़पा रही हो

     तेरी याद में मर रहा हूँ

      क्यों मुझे तड़पा रही हो

दिन में भी और रात में भी

बस तुम ही तुम दिख रही हो

क्यों मुझे तड़पा रही हो

        हा कहकर भी ना बोल रही हो

        ऐसा क्या गुनाह किया मैंने

          क्यों मुझे तड़पा रही हो

नहीं रह सकता तेरे बिना

अब तो हद भी पार हो गयीं

क्यों मुझे तड़पा रही हो

   मैं तो सिर्फ तेरी जवाब  से अटका हूँ

  और मन-ही-मन गुट-गुट के जी रहा हूँ

  ऐसा क्या गुनाह किया कि तड़पा रही हो



       (  शिवानंद सरवदे  )

बित गये ओ दिन ••••••••



जाने कहां गये ओ दिन

चुपके-चुपके एक-दूसरे को देखा करते थे

      जाने कहां गये ओ दिन

      आँखों-ही-आँखों में देखा करते थे

जाने कहां गये ओ दिन

एक-दूसरे सो चुपके बातें करते थे

         जाने कहां गये ओ दिन

          एक-दसरे से झगड़ा करते थे

जाने कहां गये ओ दिन

एक-दूसरे के हाथों-में-हाथ डालकर बैठा करते थे

       जाने कहां गये ओ दिन

        यहां-वहां की बातें किया करते थे

जाने कहां गये ओ दिन•••••••

जाने कहां गये ओ दिन••••••••

       (  शिवानंद सरवदे   )

एक आदमी



एक था आदमी
वह करता बच्चों से प्यार
वह करता इसलिए,
क्योंकि उसे नहीं थे माँ-पिताजी
वह जिंदगी भर रोता रहा

न मिला उसे किसी का सहारा
न पा सका माँ-पिताजी का प्यार
इसलिए वह कर न सका प्यार
वह अपनी कमाई देता रहा दिन-दलितों को

ऐसा आदमी बना एक महापुरुष
उसे मिली स्वर्ग की द्वार
वह जा बैठा भगवान की स्थान पर

( शिवानंद सरवदे )

मेहनत




पढ़ाता है एक
पढ़ते है सब,
फिर भी पढाने वाला ड़रता नहीं
कितनी ताकत है इसमें

माँ-पिता को छोड़कर जाता है दूर
दुश्मन पर हमेशा करता है वार
कभी न हटता पीछे,
कितनी ताकत है इसमें

यह देश हैं गरीबों का
करते हैं काम जी तोड़कर
फिरभी उन्हें फल नहीं मिलता,
यह कैसा इन्साफ हैं

होता है जब-जब जुल्म
तब आता है जुल्म को तोड़ने
वाला तूफान
वही तूफान बनता हैं वीर
ओ करेगा देश को ज्ञान का भंडार

                   ( शिवानंद सरवदे )